पंचायत चुनाव और स्कूल परीक्षाओं की तारीखें आमने-सामने, शिक्षकों की बढ़ी चिंता, दीपावली अवकाश पर भी असर की आशंका
जयपुर, 4 अक्टूबर। राजस्थान में पंचायती राज चुनावों की प्रक्रिया और सरकारी स्कूलों की अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं की प्रस्तावित तारीखें आसपास होने से शिक्षकों के सामने असमंजस की स्थिति बन गई है। एक ओर शिक्षकों को पंचायत चुनावों में ड्यूटी, प्रशिक्षण और अन्य निर्वाचन संबंधी जिम्मेदारियां निभानी होंगी, वहीं दूसरी ओर इसी अवधि में स्कूलों में अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं आयोजित की जानी प्रस्तावित हैं। ऐसे में परीक्षा व्यवस्था और चुनावी जिम्मेदारियों के बीच समन्वय को लेकर शिक्षकों में चिंता बढ़ रही है।
शिक्षा विभाग की ओर से स्कूलों में 15 से 29 अक्टूबर तक अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं प्रस्तावित बताई जा रही हैं। वहीं स्कूलों में 4 से 15 नवंबर तक दीपावली अवकाश निर्धारित है। दूसरी ओर पंचायत चुनावों का कार्यक्रम चार चरणों में घोषित किया गया है। जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के लिए 23 अक्टूबर, 29 अक्टूबर, 4 नवंबर और 14 नवंबर को मतदान होगा, जबकि पंच और सरपंच पदों के लिए 25 अक्टूबर, 31 अक्टूबर, 6 नवंबर और 16 नवंबर को मतदान कराया जाएगा।
चुनाव कार्यक्रम के साथ शिक्षकों को मतदान से पहले प्रशिक्षण और चुनाव संबंधी अन्य जिम्मेदारियों में भी लगाया जाएगा। ऐसे में अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में प्रस्तावित अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं के दौरान बड़ी संख्या में शिक्षकों के चुनावी कार्य में व्यस्त रहने की संभावना है। इससे स्कूलों में परीक्षा संचालन, वीक्षक व्यवस्था और अन्य व्यवस्थाओं पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
सबसे अधिक चिंता दीपावली अवकाश को लेकर भी सामने आ रही है। पंचायत चुनावों का कार्यक्रम नवंबर के मध्य तक चलने के कारण 4 से 15 नवंबर तक निर्धारित दीपावली अवकाश के दौरान भी कई शिक्षकों की चुनावी जिम्मेदारियां सामने आ सकती हैं। ऐसे में शिक्षकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि चुनावी ड्यूटी और परीक्षा कार्यक्रम में किस प्रकार तालमेल बनाया जाएगा तथा क्या परीक्षा कार्यक्रम में बदलाव किया जाएगा या दीपावली अवकाश प्रभावित होगा।
इस संबंध में शिक्षक संगठनों की ओर से शिक्षा विभाग और राज्य निर्वाचन विभाग से समन्वय स्थापित कर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की जा रही है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि चुनाव और परीक्षाएं दोनों ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं, इसलिए दोनों के कार्यक्रम इस तरह निर्धारित किए जाने चाहिए कि शिक्षकों पर एक साथ अतिरिक्त दबाव नहीं पड़े।
वहीं अधिकारियों की ओर से इस मामले में फिलहाल कोई स्पष्ट निर्णय या संशोधित कार्यक्रम सामने नहीं आया है। ऐसे में शिक्षकों की नजर अब शिक्षा विभाग और निर्वाचन विभाग की आगामी गाइडलाइन पर है। यदि दोनों कार्यक्रमों में बदलाव या समायोजन नहीं किया गया तो अक्टूबर और नवंबर के दौरान सरकारी स्कूलों में चुनावी जिम्मेदारियों और परीक्षा संचालन के बीच समन्वय एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
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