जेल की सलाखों के पीछे से चल रहा है अपराध का विशाल साम्राज्य
लॉरेंस बिश्नोई गैंग का आपराधिक नेटवर्क देश और दुनिया के कई हिस्सों में पूरी तरह फैल चुका है। मुख्य सरगना लॉरेंस बिश्नोई भले ही गुजरात की साबरमती जेल में बंद है, लेकिन जेल की चारदीवारी उसकी गतिविधियों के आड़े नहीं आती। सलाखों के बाहर उसका नेटवर्क लगातार वारदातों को बिना किसी रुकावट के अंजाम दे रहा है। अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर हुआ हालिया हमला इस बात का ताजा उदाहरण है कि किस तरह यह संगठित गिरोह कानून की आंखों में धूल झोंककर अपने नापाक मंसूबों को पूरा कर रहा है।
क्या है 'लो-कॉस्ट, डिस्पोजेबल शूटर' का खतरनाक ऑपरेटिंग मॉडल
जांच एजेंसियों की हालिया पड़ताल में लॉरेंस बिश्नोई गैंग का एक बेहद चौंकाने वाला और नया ऑपरेटिंग मॉडल सामने आया है, जिसे 'लो-कॉस्ट, डिस्पोजेबल शूटर' मॉडल कहा जा रहा है। इसके तहत बड़े गैंगस्टर अपने लिए सीधे तौर पर पेशेवर या महंगे हिटमैन रखने के बजाय उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों के कम उम्र और कम अनुभव वाले लड़कों को चुनते हैं। इन युवाओं को कुछ हजार रुपयों, ऐशो-आराम और विदेशों में बसाने के झूठे सपने दिखाकर इस्तेमाल किया जाता है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि यदि शूटर पकड़ा जाए, तो गिरोह के बड़े चेहरों और सरगनाओं तक पुलिस या जांच एजेंसियों के हाथ न पहुंच सकें और आसानी से इन मोहरों को अलग किया जा सके।
विदेशों और जेल से रची जाती है वारदातों की सुनियोजित साजिश
इस पूरे सिंडिकेट की कार्यप्रणाली बेहद सोची-समझी और व्यवस्थित होती है। विदेशों और देश की विभिन्न जेलों में बैठे शीर्ष गैंगस्टर मिलकर किसी बड़ी वारदात का पूरा प्लान तैयार करते हैं। इसके बाद स्थानीय स्तर पर सक्रिय छोटे-मोटे अपराधियों के माध्यम से कम उम्र के शूटर्स की तलाश शुरू की जाती है। टाइगर श्रॉफ वाले मामले में जैसे ही जांच आगे बढ़ी, तो अमेरिका में बैठे हरियाणा के गैंगस्टर अनिल पंडित का नाम सामने आया, जिसने इस हमले की पूरी जिम्मेदारी ली। अनिल पंडित ने इसके लिए हरियाणा के रेहान, बेगूसराय के ऋतिक और सोनीपत के फूल सिंह जैसे युवकों को चुना, जो पहले से ही छोटे-मोटे अपराधों के मामलों में जेल की हवा खा चुके थे। इन लड़कों को विदेशों में बैठे कुख्यात गैंगस्टरों का खौफ और रुआब दिखाकर इस खतरनाक काम के लिए तैयार किया गया था।
टारगेट की लंबी रेकी और सेलिब्रिटी रूटीन पर पैनी नजर
वारदात को अंजाम देने से पहले ये शूटर्स कई दिनों तक अपने टारगेट की गहन रेकी करते हैं। टाइगर श्रॉफ केस में हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि इन शूटर्स ने पहले 15 दिनों तक मुंबई में अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार और सलमान खान जैसे देश के बड़े सुपरस्टार्स की रेकी की थी। हालांकि, जब उन्हें यह पता चला कि इन दिग्गजों की सुरक्षा बेहद कड़ी और टाइट है, तो उन्होंने अपनी योजना बदलते हुए किसी दूसरे आसान स्टार की तलाश शुरू कर दी। इसके बाद उन्होंने लोगों से बातचीत और सेलिब्रिटी पैपराजी के वीडियो के जरिए यह थाह ली कि कौन सा अभिनेता प्रशंसकों के बीच सहज है और आसानी से तस्वीरें खिंचवाता है। उन्हें पता चला कि टाइगर श्रॉफ हर शाम को पुष्पा पार्क में फुटबॉल खेलने जाते हैं और लौटते वक्त उनके साथ केवल एक ड्राइवर होता है, जिसके बाद उन्होंने बिना चूके अपने प्लान को अमलीजामा पहना दिया।
मूसेवाला और बाबा सिद्दीकी हत्याकांड से मिलती-जुलती क्रूर कार्यशैली
लॉरेंस गैंग का यह पैटर्न पहले भी कई हाई-प्रोफाइल मामलों में देखा जा चुका है। सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड में कनाडा में बैठे गोल्डी बराड़ ने छह शूटर्स को भेजकर इस बड़ी वारदात को अंजाम दिलवाया था, जिसमें एक साल तक की लंबी तैयारी की बात सामने आई थी और शूटर अंकित सिरसा को इसकी मुख्य जिम्मेदारी दी गई थी। वहीं, वर्ष 2025 में हुए बाबा सिद्दीकी हत्याकांड की साजिश साबरमती जेल में बंद लॉरेंस के भाई अनमोल बिश्नोई ने रची थी। उसने सिग्नल ऐप के जरिए संपर्क साधकर शूटर्स को चुना और इस हत्या के लिए 17 लाख रुपये की भारी सुपारी दी थी। इन सभी मामलों से यह साफ जाहिर होता है कि यह गैंग किसी व्यक्तिगत रंजिश या एक हिटमैन पर निर्भर रहने के बजाय एक तयशुदा और बड़े नेटवर्क वाले पैटर्न पर काम करता है।
हवाला और कैश कूरियर के जरिए छिपाए जाते हैं वित्तीय लेन-देन के सुराग
जांच एजेंसियों के अनुसार, इन शूटर्स को मिलने वाला पैसा कभी भी सीधे बैंक खातों के जरिए ट्रांसफर नहीं किया जाता है। वित्तीय सुरागों को छुपाने के लिए हवाला चैनलों, कैश कूरियर और कई छोटे-छोटे स्थानीय संपर्कों का इस्तेमाल किया जाता है। सिद्धू मूसेवाला और बाबा सिद्दीकी दोनों ही मामलों में पैसों का लेनदेन हवाला के जरिए होने की पुष्टि हुई थी। कम उम्र के इन लड़कों को पैसों से ज्यादा अपराध की दुनिया में अपना नाम कमाने, सोशल मीडिया पर खौफ पैदा करने और जेल में बंद गैंगस्टरों के प्रति अपनी वफादारी साबित करने का लालच होता है। यही वजह है कि वे महज 30 से 50 हजार रुपये जैसी मामूली रकम या थोड़े से लालच में भी किसी की जान लेने जैसे जघन्य अपराध के लिए तैयार हो जाते हैं। कुल मिलाकर, यह 'डिस्पोजेबल शूटर' मॉडल सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है, जिस पर काबू पाने के लिए हर स्तर पर गहरी छानबीन की जा रही है।