133वें राष्ट्रीय दशहरा मेले में रियासतकालीन परंपराओं का भव्य निर्वहन, गढ़ पैलेस से निकली भगवान लक्ष्मीनारायण की शाही सवारी
150 फुट के रावण और कुंभकर्ण- मेघनाद के 72-72 फीट ऊंचे पुतलों का हुआ दहन, ग्रीन आतिशबाजी ने मोहा मन; देशभर के लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों ने बिखेरे संस्कृति के रंग
कोटा, 20 अक्टूबर। हाड़ौती की ऐतिहासिक विरासत, रियासतकालीन परंपराओं और भारतीय संस्कृति के गौरव का प्रतीक 133वां राष्ट्रीय दशहरा मेला-2026 मंगलवार को अभूतपूर्व उत्साह, श्रद्धा और राजसी वैभव के बीच परवान चढ़ा। विजयादशमी के अवसर पर गढ़ पैलेस से भगवान लक्ष्मीनारायण जी की शाही सवारी निकली, पारंपरिक दरीखाने में रामा-श्यामी की रस्म निभाई गई और दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच के सामने 105 फीट ऊंचे रावण सहित कुंभकर्ण और मेघनाद के विशालकाय पुतलों का दहन किया गया। भव्य आतिशबाजी, पौराणिक युद्ध प्रसंगों, लोककलाओं और हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस ऐतिहासिक आयोजन को यादगार बना दिया।
रावण दहन समारोह के मुख्य अतिथि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला रहे। इस अवसर पर ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर, विधायक संदीप शर्मा, विधायक कल्पना देवी, इंडियन रेडक्रॉस सोसाइटी के प्रदेशाध्यक्ष राजेश बिरला तथा भाजपा शहर जिला अध्यक्ष राकेश जैन विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। महापौर अनुसुइया गोस्वामी, उप महापौर विवेक राजवंशी और मेला अधिकारी ओपी मेहरा सहित अन्य जनप्रतिनिधियों एवं गणमान्य नागरिकों ने अतिथियों का स्वागत किया।
भगवान श्रीराम के आदर्शों को जीवन में उतारना ही विजयादशमी का संदेश: ओम बिरला

रावण दहन समारोह को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने दैनिक जीवन में आत्मसात करना ही विजयादशमी का सच्चा संदेश है। राष्ट्रीय दशहरा मेला हमारी प्राचीन और गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इस विरासत को संजोने, संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि रामायण और रामलीलाओं के माध्यम से हमें भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र को करीब से जानने और समझने का अवसर मिलता है। भगवान श्रीराम के आदर्श समाज में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मविश्वास और नैतिक मूल्यों का संचार करते हैं। दशहरा पर्व असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का शाश्वत प्रतीक है।

लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे थे। विजयादशमी का पर्व हमें सत्य, मर्यादा और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला अपनी भव्यता और सांस्कृतिक विशिष्टता के लिए विशेष पहचान रखता है। कोटा की जनता ने इस आयोजन को जो महत्व और गरिमा प्रदान की है, वह प्रशंसनीय है। सभी के सहयोग से इस ऐतिहासिक मेले को आने वाले वर्षों में और अधिक भव्य बनाया जाएगा। उन्होंने प्रदेशवासियों को विजयादशमी की शुभकामनाएं भी दीं।
राजसी परंपरा के साथ निकली भगवान लक्ष्मीनारायण जी की शाही सवारी

विजयादशमी के अवसर पर गढ़ पैलेस में रियासतकालीन परंपरा के अनुसार पारंपरिक दरीखाना सजाया गया। इस दौरान हाड़ौती क्षेत्र के पूर्व ठिकानों के प्रतिनिधि पारंपरिक एवं राजसी वेशभूषा में उपस्थित रहे। महापौर अनुसुइया गोस्वामी, उप महापौर विवेक राजवंशी सहित अन्य गणमान्य नागरिकों ने एक-दूसरे को विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए रामा-श्यामी की परंपरा निभाई। आयोजन में जापान, चीन और ब्रिटेन से आए विदेशी पर्यटक भी मौजूद रहे।
पूजा-अर्चना के बाद शुभ मुहूर्त में शाम 6:31 बजे भगवान लक्ष्मीनारायण जी की सवारी गढ़ पैलेस से हाथी पर सवार होकर पूरे शाही लवाजमे के साथ रवाना हुई। कोटा रियासत के पूर्व महाराव इज्येराज सिंह खुली जीप में सवार होकर शोभायात्रा में शामिल हुए। शोभायात्रा गढ़ पैलेस से किशोरपुरा दरवाजे होते हुए दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच तक पहुंची।
यात्रा में सबसे आगे घुड़सवार और सेना के जवान चल रहे थे। हाथी पर विराजित भगवान लक्ष्मीनारायण जी के विमान के साथ चंवर ढुलाते सेवक शाही परंपरा की गरिमा बढ़ा रहे थे। मार्ग के दोनों ओर खड़े हजारों श्रद्धालुओं ने भगवान के जयकारे लगाकर शोभायात्रा का स्वागत किया।
शोभायात्रा में सजीव हुए रामायण के युद्ध प्रसंग

भगवान लक्ष्मीनारायण जी की शोभायात्रा का प्रमुख आकर्षण रामायण के पौराणिक प्रसंगों पर आधारित जीवंत दृश्य रहे। शोभायात्रा में प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता, सुग्रीव, अंगद, विभीषण, नल-नील, जामवंत और हनुमान सहित विभिन्न पात्रों ने रामायण के प्रसंगों को साकार किया। रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पात्रों ने भी युद्ध दृश्यों को प्रभावशाली बनाया।
वानर सेना और राक्षस सेना के बीच सड़क पर प्रस्तुत युद्ध, रावण और जटायु का संघर्ष तथा खप्पर लेकर असुरों का संहार करती मां कालिका का रौद्र रूप दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहा। ऊंटगाड़ी पर बजते युद्ध के नगाड़ों, ढोल-ताशों की गूंज और रामधुनी के बीच तलवारबाजी करते वानर सेना के कलाकारों ने वातावरण को रोमांच और भक्ति से भर दिया।
देशभर के लोक कलाकारों ने प्रस्तुत की सांस्कृतिक विविधता
शोभायात्रा को भव्य और आकर्षक बनाने के लिए देश के विभिन्न राज्यों से आए लोक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से भारतीय संस्कृति की विविधता को जीवंत किया। राजस्थान के प्रसिद्ध कच्ची घोड़ी नृत्य, कजरी नृत्य तथा उदयपुर क्षेत्र की भील और सहरिया जनजातियों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को आकर्षित किया।
इसके साथ ही अरुणाचल प्रदेश के टप्पू युद्ध नृत्य, पश्चिम बंगाल के छाऊ नृत्य और केरल के कुम्माटी लोक नृत्य ने शोभायात्रा को राष्ट्रीय सांस्कृतिक स्वरूप प्रदान किया। आर्मी बैंड और पुलिस बैंड की स्वर लहरियों के बीच महिलाओं के मंगल गीतों ने आयोजन की पारंपरिक गरिमा को और बढ़ाया।
विधि-विधान से पूजन के बाद शुरू हुआ रावण दहन

दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच के सामने रावण दहन से पूर्व कोटा रियासत के पूर्व महाराव इज्येराज सिंह ने विधि-विधान के साथ ज्वारा पूजन और श्री सीता जी के पाने का विशेष पूजन किया। धार्मिक अनुष्ठानों के बाद परंपरा के अनुसार उन्होंने रावण की नाभि में स्थित अमृत कलश पर तीर चलाकर उसे भेदा। इसके साथ ही रावण के कुनबे के दहन का क्रम शुरू हुआ।
तय मुहूर्त के अनुसार रात 8:24 बजे कुंभकर्ण के पुतले का दहन शुरू हुआ। इसके बाद रात 8:30 बजे मेघनाद के पुतले में आग लगाई गई और रात 8:34 बजे 105 फीट ऊंचे विशालकाय रावण के पुतले का दहन आरंभ हुआ। कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले 72-72 फीट ऊंचे थे।

रावण के पुतले में ग्रीन आतिशबाजी का प्रयोग किया गया। पुतले की छतरी, मुकुट, नक्काशी, ढाल और कंधों से उठती आतिशी रोशनी ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। नाभि चक्र के घूमने और रावण के सिरों में आग लगने के साथ ही मैदान में जय श्रीराम के जयकारे गूंज उठे। रात करीब 8:38 बजे तक रावण का विशालकाय पुतला जलकर राख हो गया। इससे पहले वानर सेना ने हनुमान चालीसा का पाठ किया।
रंगीन आतिशबाजी से जगमगाया दशहरा मैदान
रावण दहन के दौरान दशहरा मैदान में उमड़े जनसैलाब का उत्साह देखते ही बन रहा था। श्रीराम रंगमंच से करीब 45 मिनट तक चली रंगीन आतिशबाजी ने आसमान को रोशनी से भर दिया। रंग-बिरंगी आतिशी छटा और गूंजते पटाखों के बीच दर्शकों ने इस ऐतिहासिक क्षण को अपने मोबाइल कैमरों में कैद किया।
कोटा शहर के साथ-साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य प्रदेशों से आए लोगों ने भी आयोजन का आनंद लिया। भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। रावण दहन के साथ ही दशहरा मैदान में उत्सव, उल्लास और धार्मिक आस्था का अनूठा संगम दिखाई दिया।
सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक आयोजन का संगम
133वें राष्ट्रीय दशहरा मेले का यह आयोजन कोटा की ऐतिहासिक पहचान, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रभावशाली उदाहरण बना। एक ओर गढ़ पैलेस की रियासतकालीन परंपराओं का निर्वहन हुआ, तो दूसरी ओर देशभर की लोककलाओं, सजीव रामायण प्रसंगों और आधुनिक आतिशबाजी ने आयोजन को नई भव्यता प्रदान की।
भगवान श्रीराम के आदर्शों, सत्य की विजय और बुराई के अंत का संदेश देते हुए संपन्न हुआ विजयादशमी समारोह एक बार फिर यह प्रेरणा दे गया कि हमारी सांस्कृतिक विरासत केवल उत्सवों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन में मर्यादा, सदाचार और सत्य के मूल्यों को अपनाने का माध्यम भी है।