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27 देशों के 400 से अधिक भारतीय मूल के शिक्षाविदों की अपील, ‘संवैधानिक रास्ते से सुलझाएं मतभेद’

Admin Desk
20 Oct 2026, 05:16 PM
Pramukh Samvad
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‘स्पेयर इंडिया फ्रॉम एनार्की’ बयान में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखने की अपील, डॉ. आंबेडकर के संवैधानिक तरीकों के संदेश का किया उल्लेख

नई दिल्ली, 20 अक्टूबर। दुनिया के 27 देशों में विभिन्न विश्वविद्यालयों से जुड़े 400 से अधिक भारतीय मूल के छात्रों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और पूर्व छात्रों ने भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा संवैधानिक व्यवस्था को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए एक संयुक्त बयान जारी किया है। ‘स्पेयर इंडिया फ्रॉम एनार्की’ यानी ‘भारत को अराजकता से बचाएं’ शीर्षक वाले इस बयान में राजनीतिक और सामाजिक मतभेदों को संवैधानिक संस्थाओं के दायरे में बहस, संवाद और असहमति के लोकतांत्रिक तरीकों से सुलझाने का आह्वान किया गया है।

27 देशों के शिक्षाविदों और छात्रों ने जताई चिंता

संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड, आयरलैंड, इटली, स्पेन, स्वीडन, नॉर्वे, पोलैंड, रूस, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, मलेशिया, इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात सहित विभिन्न देशों में अध्ययनरत या कार्यरत भारतीय मूल के लोग शामिल हैं। जारी विवरण के अनुसार, हस्ताक्षरकर्ताओं की संख्या 400 से अधिक है। इनमें विद्यार्थी, शोधकर्ता, शिक्षाविद् और विश्वविद्यालयों के पूर्व छात्र शामिल हैं।

दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़े हस्ताक्षरकर्ता

बयान से संबद्ध सूची में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी), ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, प्रिंसटन विश्वविद्यालय, हार्वर्ड विश्वविद्यालय, येल विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, कोलंबिया विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर और टोरंटो विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े लोगों के नाम शामिल बताए गए हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति का इन संस्थानों से जुड़ा होना संबंधित विश्वविद्यालय की ओर से बयान का आधिकारिक समर्थन होने का प्रमाण नहीं है। यह अंतर बयान के संस्थागत संदर्भ को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं पर बहस के बीच आया बयान

यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब भारत में निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर राजनीतिक बहस और विरोध प्रदर्शन जारी हैं। विपक्षी दलों तथा विभिन्न समूहों ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर अलग-अलग पक्षों के अपने तर्क हैं। विरोध प्रदर्शनों के बीच मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी उठाई गई है।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने अपने बयान में चुनावी परिणामों को स्वीकार करने, निर्वाचन प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सार्वजनिक विश्वास जैसे विषयों पर चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि राजनीतिक असहमति को इस तरह आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर हो।

अदालत में विचाराधीन मामलों के राजनीतिकरण पर आपत्ति

बयान में आरोप लगाया गया है कि अदालतों में विचाराधीन मामलों का इस्तेमाल भारतीय लोकतंत्र के प्रति संदेह पैदा करने के लिए किया जा रहा है और इन मुद्दों को सड़क पर होने वाले प्रदर्शनों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाता है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने इसे लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने वाला विरोधाभास बताया है।

हालांकि, बयान में किसी विशिष्ट विरोध प्रदर्शन या संगठन का नाम लेकर आरोप नहीं लगाया गया है। इसमें प्रस्तुत विचार हस्ताक्षरकर्ताओं के आकलन और राजनीतिक परिस्थितियों के बारे में उनकी चिंता को दर्शाते हैं। इन आरोपों को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

डॉ. भीमराव आंबेडकर के संवैधानिक तरीकों के संदेश का उल्लेख

संयुक्त बयान में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के उस ऐतिहासिक विचार का उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने संवैधानिक तरीकों के महत्व पर जोर दिया था। संविधान सभा में 25 नवंबर 1949 को अपने समापन भाषण में आंबेडकर ने संवैधानिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संवैधानिक तरीकों को अपनाने और हिंसक क्रांतिकारी तरीकों को छोड़ने की आवश्यकता बताई थी। उन्होंने ऐसे हिंसक तरीकों को ‘अराजकता का व्याकरण’ कहा था।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने इसी विचार को आधार बनाते हुए कहा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेदों के समाधान के लिए संविधानसम्मत रास्तों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनके अनुसार, लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास बनाए रखना और राजनीतिक मतभेदों को स्थापित संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सुलझाना देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए आवश्यक है।

असहमति लोकतंत्र का हिस्सा, लेकिन संवैधानिक मर्यादा भी जरूरी

बयान में यह भी स्पष्ट किया गया है कि असहमति, विरोध और बहस लोकतंत्र के अनिवार्य अंग हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए, जिन्हें वे लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक ढांचे को कमजोर करने वाला मानते हैं।

उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक संगठनों से आग्रह किया है कि वे अपनी चिंताओं को सामने रखें, एक-दूसरे के विचारों को सुनें और मतभेदों का समाधान बहस, चर्चा, संवाद तथा लोकतांत्रिक असहमति के माध्यम से तलाशें। बयान में संवैधानिक संस्थाओं के दायरे में समाधान खोजने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति विश्वास बनाए रखने पर जोर दिया गया है।

लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का आह्वान

संयुक्त बयान का व्यापक संदेश यह है कि लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए संवैधानिक संस्थाओं, न्यायिक स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण असहमति और संवाद की परंपरा का सम्मान भी आवश्यक है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारत से लोकतांत्रिक मूल्यों का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करने की अपील की है, जो दुनिया भर में संवैधानिक शासन और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के महत्व को रेखांकित करे।

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