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उत्तर प्रदेश में पीजी करने वाले डॉक्टरों को 10 साल करनी होगी सरकारी सेवा, बीच में छोड़ी नौकरी तो देना होगा 1 करोड़ रुपये

Sanjay kumar
13 Oct 2026, 10:48 PM
Pramukh Samvad
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लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और ग्रामीण एवं दुर्गम क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण व्यवस्था की है। इसके तहत प्रांतीय चिकित्सा सेवा संवर्ग (पीएमएस) के अंतर्गत कार्यरत डॉक्टरों को एमडी, एमएस और डीएनबी जैसे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की पढ़ाई पूरी करने के बाद 10 वर्ष तक सरकारी अस्पतालों में सेवाएं देनी होंगी। निर्धारित अवधि तक सेवा नहीं देने पर संबंधित डॉक्टर को एक करोड़ रुपये की राशि राजकीय कोष में जमा करानी होगी।

इस व्यवस्था के तहत प्रदेश के दुर्गम और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत करीब 150 डॉक्टरों के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में शामिल होने की संभावना है। इन डॉक्टरों को पीजी कोर्स में प्रवेश के लिए स्वास्थ्य विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) प्राप्त करना अनिवार्य होगा। एनओसी जारी कराने के दौरान डॉक्टरों को निर्धारित शर्तों के साथ बॉन्ड भी भरना होगा।

ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने वाले डॉक्टरों को मिलेगी प्राथमिकता

प्रांतीय चिकित्सा सेवा संवर्ग के तहत दुर्गम एवं पिछड़े जिलों में कार्यरत एमबीबीएस डॉक्टरों को स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए नियमानुसार अतिरिक्त भारांक का लाभ दिया जाता है। यह सुविधा ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग तीन वर्ष तक सेवाएं देने वाले डॉक्टरों को मिलती है। इसके लिए डॉक्टरों की आयु 45 वर्ष से कम होना आवश्यक है।

नीट पीजी का परिणाम जारी होने के बाद पात्र डॉक्टरों को एमडी, एमएस और डीएनबी पाठ्यक्रमों की काउंसलिंग में शामिल होने की अनुमति दी गई है। विभागीय जानकारी के अनुसार, अब तक करीब 140 डॉक्टर अनुमति पत्र प्राप्त कर चुके हैं। अनुमति प्राप्त करने की अंतिम तिथि 15 अक्टूबर निर्धारित की गई है। ऐसे में इस बार पीजी पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने वाले पीएमएस डॉक्टरों की संख्या लगभग 150 या इससे अधिक होने की संभावना है।

एनओसी के साथ बॉन्ड भरना अनिवार्य

पीजी पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के इच्छुक डॉक्टरों को विभाग से एनओसी प्राप्त करते समय बॉन्ड भरना होगा। इस बॉन्ड के तहत उन्हें अपनी पढ़ाई और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद 10 वर्ष तक सरकारी चिकित्सालयों में सेवाएं देनी होंगी। यदि कोई डॉक्टर निर्धारित अवधि तक सरकारी सेवा नहीं देता है, तो उसे एक करोड़ रुपये की राशि राजकीय कोष में जमा करानी होगी।

इसके अतिरिक्त बॉन्ड प्रक्रिया के दौरान दो विभागीय जमानतदार देना भी अनिवार्य होगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य विशेषज्ञ डॉक्टरों को सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़े रखना और ग्रामीण एवं दुर्गम क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ाना है।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी दूर करने पर जोर

ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती रही है। एमडी, एमएस और डीएनबी जैसे पाठ्यक्रमों के माध्यम से डॉक्टरों की विशेषज्ञता बढ़ने से सरकारी अस्पतालों में उपचार की गुणवत्ता बेहतर होने की उम्मीद है। दस वर्ष की अनिवार्य सेवा और बॉन्ड की शर्तों के जरिए प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले डॉक्टरों की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है।

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