मुनि योगसागर महाराज बोले- संयम के मार्ग में विकल्प नहीं, दृढ़ संकल्प जरूरी
कोटा, 10 अक्टूबर। पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, दादाबाड़ी नसियां जी, कोटा में शनिवार को परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज के जीवन, व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित अंतरराष्ट्रीय विद्वत ब्रह्मचारी संगोष्ठी का प्रथम सत्र श्रद्धा और आध्यात्मिक प्रेरणा के वातावरण में आयोजित हुआ। ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर महाराज एवं मुनि प्रणवसागर महाराज के सानिध्य में आयोजित संगोष्ठी में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए ब्रह्मचारी भैया ने आचार्य श्री के जीवन संस्मरण साझा करते हुए उनके आदर्शों को आत्मसात करने का आह्वान किया।
प्रातः 7:30 से 9:30 बजे तक आयोजित सत्र की अध्यक्षता जयपुर के डॉ. धर्मेंद्र ने की। आचार्य श्री विद्यासागर पाठशाला, दादाबाड़ी की बालिकाओं ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। दीप प्रज्वलन एवं चित्र अनावरण के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। संचालन इंदौर के ब्रह्मचारी सुनील ने किया, जबकि ब्रह्मचारीअनिल ने मार्गदर्शन प्रदान किया।
अशोकनगर से पधारे दस प्रतिमाधारी ब्रह्मचारी श्री अशोक भैया जी ने कहा कि आचार्य श्री का जीवन त्याग, तपस्या, आत्मसंयम और राष्ट्रहित की प्रेरणा देता है। हथकरघा के माध्यम से स्वावलंबन को बढ़ावा देना तथा भारत को विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित देखना उनकी भावना थी। उन्होंने कहा कि सच्चा शिष्य वही है, जो गुरु के उपदेशों को अपने जीवन में उतारता है।
मुनि श्री योगसागर ने सुनाए प्रेरक संस्मरण
प्रथम सत्र के समापन पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री योगसागर महाराज ने आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के जीवन से जुड़े प्रेरक संस्मरण सुनाए। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री की अपने गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा और समर्पण प्रत्येक साधक के लिए आदर्श है। मनुष्य सांसारिक मोह-ममता और मेरा-तेरा में उलझकर जीवन का वास्तविक उद्देश्य भूल जाता है। उसे विचार करना चाहिए कि जीवन केवल बाहरी उपलब्धियों के लिए है या आत्मकल्याण के लिए भी।
मुनि श्री ने कहा कि संयम के मार्ग पर नए-नए विकल्प और बाधाएं खड़ी करने के बजाय दृढ़ संकल्प, निष्ठा और समर्पण आवश्यक हैं। आचार्य श्री ने अल्पायु में ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार किया और 22 वर्ष की आयु में मुनि दीक्षा ग्रहण की। उनका जीवन त्याग, आत्मशुद्धि और साधना की प्रेरणा देता है।
उन्होंने आचार्य श्री के साहित्यिक योगदान का उल्लेख करते हुए बताया कि पंडित कैलाशचंद जी शास्त्री ने वर्ष 1974 में उनके जीवन को देखकर एक नवीन आध्यात्मिक नक्षत्र के उदय होने की भावना व्यक्त की थी। वर्ष 1975 में रचित जैन गीता (श्रमण सूक्तम्) सहित उनका साहित्य भारतीय अध्यात्म और जैन दर्शन की अमूल्य धरोहर है।
संगोष्ठी में आचार्य श्री को महामना, अध्यात्मयोगी, संत शिरोमणि, श्रमण संस्कृति का सूर्य, महाकवि और युगद्रष्टा महामनीषी के रूप में स्मरण किया गया। वक्ताओं ने कहा कि उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि उनके बताए संयम, साधना, स्वावलंबन और मानवकल्याण के मार्ग पर चलना है।
धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने किया पुण्यार्जन
प्रशासनिक मंत्री अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, शास्त्र भेंट एवं कलश स्थापना का पुण्यार्जन राजेंद्र जी, रजनी जी एवं समस्त गोधा परिवार ने किया।
धर्मचंद धनोप्या ने भक्तामर विधान के पुण्यार्जन की जानकारी दी। सुनील माडिया के अनुसार मुनि योगसागर महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ सोनू एवं रंजीता जैन, जयस्थल वाले परिवार तथा मुनि प्रणवसागर महाराज के आहारदान का सौभाग्य संतोष दुगेरिया, पनवाड़ वाले परिवार को प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर हर्षा कोटिया को मिला