सुप्रीम कोर्ट ने कहा—नियम ऐसे हों जिनसे किसी भी वर्ग के विद्यार्थी को असुरक्षा महसूस न हो, केंद्र सरकार विशेषज्ञ कमेटी बनाने पर कर रही विचार, 2026 के नए नियमों पर पहले ही लग चुकी है रोक
नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा बनाए गए नए इक्विटी नियमों को लेकर केंद्र सरकार ने अपने रुख में बड़ा बदलाव किया है। 5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने इन विवादित नियमों की समीक्षा के लिए विशेष विशेषज्ञ कमेटी गठित करने पर विचार करने की बात कही। सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार चाहती है कि नियमों की दोबारा समीक्षा हो और ऐसी व्यवस्था तैयार की जाए जिससे किसी भी वर्ग के विद्यार्थी के मन में असुरक्षा, भेदभाव या उपेक्षा की भावना पैदा न हो। सरकार के इस रुख को विवादित नियमों पर पुनर्विचार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
13 जनवरी को लागू हुए थे नए नियम
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से 'UGC Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026' अधिसूचित किए थे। इन नियमों ने वर्ष 2012 के पुराने नियमों की जगह ली थी। इसके तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में समान अवसर केंद्र, इक्विटी कमेटी और शिकायत निवारण व्यवस्था स्थापित करना अनिवार्य किया गया था। शिकायतों की जांच और कार्रवाई के लिए भी समय सीमा निर्धारित की गई थी।
जातिगत भेदभाव की परिभाषा बनी विवाद की मुख्य वजह
नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हुआ। नियमों की धारा 3(1)(c) में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के सदस्यों के खिलाफ जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव का उल्लेख किया गया था। सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों और संगठनों ने सवाल उठाया कि यदि किसी सामान्य वर्ग के विद्यार्थी के साथ भी जाति के आधार पर भेदभाव होता है तो उसे इस विशेष व्यवस्था के तहत समान संरक्षण क्यों नहीं मिलना चाहिए? उनका कहना था कि भेदभाव रोकने के नियम सभी विद्यार्थियों के लिए समान होने चाहिए।
झूठी शिकायतों से भविष्य प्रभावित होने की आशंका
नियमों का विरोध करने वाले संगठनों ने यह भी आशंका जताई कि शिकायतों के दुरुपयोग को रोकने के लिए पर्याप्त स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। उनका तर्क था कि आपसी विवाद या व्यक्तिगत दुश्मनी के चलते किसी विद्यार्थी अथवा शिक्षक के खिलाफ गलत शिकायत की जा सकती है, जिससे उसकी शिक्षा, प्रतिष्ठा और भविष्य प्रभावित हो सकता है। हालांकि नियमों के समर्थकों का कहना है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की वास्तविक समस्या को देखते हुए मजबूत शिकायत व्यवस्था जरूरी है।
29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने लगा दी थी रोक
नए नियमों को चुनौती दिए जाने के बाद 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इनके क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने नियमों की कुछ परिभाषाओं को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट बताते हुए इनके दुरुपयोग की आशंका जताई थी। अदालत ने सवाल उठाया था कि जातिगत भेदभाव की परिभाषा को कुछ वर्गों तक सीमित रखने की जरूरत क्यों पड़ी और क्या नियम सामाजिक एकता तथा समानता की संवैधानिक भावना के अनुरूप हैं। अदालत ने अगले आदेश तक 2012 के पुराने नियमों को प्रभावी रखने का निर्देश दिया था।
5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने रखा अपना पक्ष, कमेटी गठन पर विचार
5 नवंबर को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यूजीसी के विवादित नियमों को लेकर केंद्र सरकार का ध्यान उनकी कमियों और संभावित प्रभावों की ओर आकर्षित किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि नियम बनाते समय सभी वर्गों के विद्यार्थियों के हितों और उनकी भावनाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए। अदालत का जोर इस बात पर रहा कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें किसी भी विद्यार्थी को उसकी जाति या सामाजिक पहचान के कारण असुरक्षा अथवा भेदभाव का सामना न करना पड़े।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार को सुझाव दिया कि वह इन नियमों पर नए सिरे से विचार करे और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों की कमेटी गठित करके उनकी समीक्षा करवाए। अदालत की चिंता थी कि नियमों की भाषा और प्रावधान इतने स्पष्ट होने चाहिए कि उनका गलत अर्थ निकालने या दुरुपयोग करने की गुंजाइश नहीं रहे। साथ ही जातिगत भेदभाव रोकने के मूल उद्देश्य और वंचित समुदायों को मिलने वाली सुरक्षा भी किसी स्थिति में कमजोर नहीं होनी चाहिए।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि सभी वर्गों के विद्यार्थियों के हितों की रक्षा हो और किसी के मन में यह आशंका न रहे कि नियमों के कारण उसके साथ अन्याय हो सकता है। सरकार इन नियमों की समीक्षा के लिए एक विशेष कमेटी गठित करने पर विचार कर रही है, जो पूरे मामले को नए सिरे से देख सके।
सरकार के इस पक्ष से स्पष्ट हुआ कि विवादित नियमों को लेकर अब केवल कानूनी जवाब देने के बजाय उनकी व्यावहारिक उपयोगिता और सभी वर्गों पर पड़ने वाले प्रभाव की समीक्षा की दिशा में भी कदम उठाया जा सकता है। कमेटी के माध्यम से नियमों की परिभाषा, शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था, जांच प्रक्रिया, संस्थानों की जिम्मेदारी और शिकायतों के संभावित दुरुपयोग जैसे विषयों पर विचार किया जा सकता है। हालांकि कमेटी का औपचारिक गठन और उसकी संरचना अभी घोषित नहीं हुई है।
सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया। अब सरकार को इस अवधि में अपने प्रस्ताव पर आगे विचार करना है। अगली सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि सरकार कमेटी के गठन और नियमों की समीक्षा को लेकर अदालत के सामने क्या ठोस जानकारी रखती है। इस घटनाक्रम को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि नए नियमों को लेकर देशभर में बहस और विरोध के बीच सरकार ने अदालत के सामने उनकी समीक्षा का रास्ता अपनाने की बात कही है।
अब आगे क्या होगा?
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसा संतुलित नियम तैयार करने की है, जिसमें SC, ST और OBC सहित सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को जातिगत भेदभाव से प्रभावी सुरक्षा मिले और सामान्य वर्ग सहित किसी भी विद्यार्थी के साथ अन्याय न हो। शिकायतों की निष्पक्ष जांच, झूठी शिकायतों के दुरुपयोग को रोकने और संस्थानों की जवाबदेही तय करने जैसे विषय भी समीक्षा का हिस्सा हो सकते हैं।
नियम वापस होंगे या नए स्वरूप में आएंगे?
5 नवंबर की सुनवाई के बाद अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सरकार 2026 के नियमों को पूरी तरह वापस लेने जा रही है। फिलहाल सरकार ने केवल उनकी समीक्षा के लिए कमेटी गठित करने पर विचार करने की बात कही है। जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई नया आदेश नहीं देता, जनवरी में जारी अंतरिम आदेश के अनुसार 2012 के पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे।
समानता के साथ सभी को न्याय मिले, यही सबसे बड़ी चुनौती
इस पूरे विवाद का मूल सवाल यही है कि देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में किसी भी विद्यार्थी के साथ जाति या अन्य पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियम ऐसे हों जो पीड़ित को न्याय दिलाएं, किसी निर्दोष को झूठी शिकायत के कारण परेशान न करें और समाज के सभी वर्गों के बीच समानता, विश्वास और भाईचारे को मजबूत बनाएं। अब सबकी नजर सरकार की प्रस्तावित समीक्षा और सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर रहेगी।