नई दिल्ली, 27 अक्टूबर। देश के प्रमुख मीडिया संगठनों ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के कुछ प्रावधानों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की ओर से दायर इस याचिका में कहा गया है कि मौजूदा स्वरूप में कानून लागू होने से पत्रकारिता की स्वतंत्रता, खोजी खबरों के प्रकाशन और पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने के कारण समाचार संस्थानों को खबर तैयार करने और प्रकाशित करने के दौरान कई कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है। विशेष रूप से उन खबरों में मुश्किलें पैदा हो सकती हैं, जिनमें भ्रष्टाचार, सरकारी कामकाज में अनियमितताओं, सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के कथित दुराचार और दूसरे जनहित से जुड़े मामलों की पड़ताल की जाती है।
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने याचिका और कानून के संबंधित प्रावधानों पर रोक लगाने की मांग पर सरकार से जवाब मांगा है। मामले में अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित है।
क्या है पूरा मामला और मीडिया संगठनों को किस बात की चिंता है?
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 का उद्देश्य लोगों के व्यक्तिगत डिजिटल डेटा की सुरक्षा करना और उसके इस्तेमाल के लिए नियम निर्धारित करना है। आसान शब्दों में कहें तो यह कानून इस बात से जुड़ा है कि किसी व्यक्ति की डिजिटल जानकारी कौन इस्तेमाल कर सकता है, उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा सकता है और संबंधित व्यक्ति के डेटा के संबंध में क्या जिम्मेदारियां निभानी होंगी।
इस कानून का उद्देश्य नागरिकों की निजता की रक्षा करना है। हालांकि, मीडिया संगठनों का कहना है कि पत्रकारिता के कामकाज की प्रकृति आम व्यावसायिक गतिविधियों से अलग होती है। पत्रकारों को कई बार किसी मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए संबंधित व्यक्तियों की जानकारी जुटानी पड़ती है। कुछ मामलों में संबंधित व्यक्ति से पहले अनुमति लेना संभव नहीं होता, क्योंकि ऐसा करने से जांच प्रभावित हो सकती है या सबूतों को छिपाने की आशंका पैदा हो सकती है।
यही वजह है कि मीडिया संगठनों ने कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट और पर्याप्त छूट की मांग की है। उनका तर्क है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि जनहित से जुड़ी खबरों की पड़ताल और प्रकाशन अनावश्यक कानूनी बाधाओं के कारण प्रभावित न हों।
‘न्यूजरूम बंद करने की नौबत आ सकती है’
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने दलील दी कि कानून के कुछ प्रावधान मीडिया संस्थानों के सामान्य कामकाज को मुश्किल बना सकते हैं। उन्होंने चिंता जताई कि यदि पत्रकारों को किसी व्यक्ति से संबंधित खबर प्रकाशित करने से पहले उसी व्यक्ति की सहमति लेने के लिए बाध्य होना पड़ा, तो पत्रकारिता की बुनियादी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
दीवान ने अदालत को बताया कि समाचारों में समय का विशेष महत्व होता है। कई खबरें ऐसी होती हैं, जिनका संबंध तत्काल सामने आई घटनाओं, सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के फैसलों या कथित अनियमितताओं से होता है। यदि खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेना जरूरी हो जाए, तो खबर में देरी हो सकती है और कुछ मामलों में सच्चाई सामने लाना भी कठिन हो सकता है।
याचिकाकर्ताओं की चिंता यह भी है कि यदि किसी खबर में इस्तेमाल की गई व्यक्तिगत जानकारी को लेकर बाद में कानूनी विवाद पैदा होता है, तो मीडिया संस्थानों पर कार्रवाई का खतरा बढ़ सकता है। उनके मुताबिक, इससे समाचार संस्थान संवेदनशील खबरें प्रकाशित करने से पहले कई बार सोचने को मजबूर हो सकते हैं।
हालांकि, यह मीडिया संगठनों की ओर से अदालत में रखी गई दलील है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस मामले में कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है और न ही याचिकाकर्ताओं की सभी आशंकाओं पर अंतिम फैसला सुनाया है।
क्या खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति लेनी होगी?
यह इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
मीडिया संगठनों के अनुसार, कानून के तहत व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल से संबंधित सूचना, सहमति और डेटा मिटाने जैसी जिम्मेदारियां पत्रकारिता के कुछ कार्यों में व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा कर सकती हैं।
उदाहरण के लिए, यदि कोई पत्रकार किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार की जांच कर रहा है और उसे संबंधित दस्तावेजों या डिजिटल रिकॉर्ड से महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है, तो जांच के दौरान उस अधिकारी को पहले ही जानकारी देना पड़ताल को प्रभावित कर सकता है। इसी तरह, किसी सार्वजनिक मामले में शामिल व्यक्ति से पहले अनुमति लेने की बाध्यता खबर के प्रकाशन में देरी का कारण बन सकती है।
मीडिया संगठनों का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में पत्रकारिता के लिए अलग सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि जनहित में जुटाई गई जानकारी का जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जा सके।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि याचिका का अर्थ यह नहीं है कि कानून के तहत हर खबर प्रकाशित करने से पहले हर व्यक्ति की सहमति लेना अनिवार्य है। वास्तविक कानूनी स्थिति संबंधित प्रावधानों, उनके दायरे और लागू अपवादों पर निर्भर करेगी। मीडिया संगठनों की मांग है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट दी जाए, जिससे इस संबंध में अनिश्चितता दूर हो सके।
CJI सूर्यकांत ने कहा—नागरिकों और मीडिया के अधिकारों में संतुलन जरूरी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों और मीडिया की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थीं।
मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं से यह भी कहा कि वे इस क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं और केंद्र सरकार के साथ-साथ अदालत को भी ऐसे सुझाव दे सकते हैं, जिनसे कानून के दुरुपयोग को रोका जा सके और जरूरी सुरक्षा उपाय तय किए जा सकें।
इससे संकेत मिलता है कि मामले में केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों की निजता और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। अदालत के सामने चुनौती यह है कि ऐसा संतुलन कैसे बनाया जाए, जिससे लोगों की निजी जानकारी का अनुचित इस्तेमाल न हो और पत्रकार जनहित के मामलों की निष्पक्ष पड़ताल भी कर सकें।
फिलहाल अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अंतिम निर्णय आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि चुनौती दिए गए प्रावधानों में बदलाव, व्याख्या या किसी अन्य प्रकार की कानूनी राहत की आवश्यकता है या नहीं।
21 बड़े मीडिया संगठनों के डिजिटल विंग याचिका में शामिल
यह याचिका डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन की ओर से दायर की गई है। एसोसिएशन में देश के 21 प्रमुख मीडिया संगठनों के डिजिटल विंग शामिल हैं।
इनमें द इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, इंडिया टुडे, टाइम्स ग्रुप, जी, एनडीटीवी और नेटवर्क 18 जैसे प्रमुख मीडिया समूह शामिल हैं।
एसोसिएशन ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। यह अनुच्छेद नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है। इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार पर संभावित प्रभाव का मुद्दा उठाया है। याचिका में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट की कई धाराओं और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स, 2025 के कुछ नियमों को चुनौती दी गई है।
कानून की किन धाराओं और नियमों पर उठाए गए सवाल?
याचिका में अधिनियम की धारा 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। इसके साथ ही नियम 16, 17 और 23 को भी चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन प्रावधानों का दायरा और इनके इस्तेमाल की प्रक्रिया पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए समस्याएं पैदा कर सकती हैं। खास तौर पर डेटा के इस्तेमाल से जुड़ी जिम्मेदारियों, सरकार की जानकारी मांगने की शक्तियों और कुछ परिस्थितियों में सूचना तक पहुंच सीमित करने के अधिकार को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
मीडिया संगठनों का तर्क है कि इन शक्तियों के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट सीमाएं और पर्याप्त सुरक्षा उपाय होने चाहिए। उनके मुताबिक, यदि नियमों की व्याख्या बहुत व्यापक तरीके से की जाती है, तो इससे पत्रकारों और समाचार प्रकाशकों के कामकाज पर अनावश्यक दबाव पड़ सकता है।
खोजी पत्रकारिता पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका क्यों?
खोजी पत्रकारिता का उद्देश्य ऐसे तथ्यों और मामलों को सामने लाना है, जो आम तौर पर सार्वजनिक जानकारी में नहीं होते या जिन्हें सामने आने से रोकने की कोशिश की जा सकती है। भ्रष्टाचार, सरकारी योजनाओं में कथित गड़बड़ी, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग, पद के दुरुपयोग और प्रशासनिक अनियमितताओं से जुड़े मामलों में पत्रकारों को दस्तावेजों, रिकॉर्ड, प्रत्यक्षदर्शियों और अन्य स्रोतों से जानकारी जुटानी पड़ सकती है।
कई बार ऐसी जानकारी देने वाले लोग अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करना चाहते। उन्हें डर हो सकता है कि उनकी पहचान उजागर होने पर उन्हें नौकरी, सुरक्षा या व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। मीडिया संगठनों का कहना है कि यदि व्यक्तिगत डेटा से संबंधित नियमों के कारण पत्रकारों को हर स्थिति में संबंधित व्यक्ति की सहमति लेनी पड़े या जानकारी देने की प्रक्रिया पहले से बतानी पड़े, तो खोजी पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी मामले में कथित अनियमितताओं की जांच चल रही हो और पत्रकार को संबंधित रिकॉर्ड मिल जाएं, तो खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित पक्ष को इसकी जानकारी देना जांच को प्रभावित कर सकता है। इसी तरह, किसी व्हिसलब्लोअर की पहचान उजागर होने का खतरा होने पर वह महत्वपूर्ण जानकारी साझा करने से पीछे हट सकता है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि पत्रकारिता के नाम पर किसी की भी निजी जानकारी बिना किसी सीमा के प्रकाशित की जा सकती है। निजता का अधिकार भी महत्वपूर्ण है। विवाद इस बात पर है कि जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता के लिए ऐसी कौन-सी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे निजता और प्रेस की स्वतंत्रता दोनों की रक्षा हो सके।
सरकार की जानकारी मांगने की शक्तियों पर भी सवाल
याचिका में अधिनियम की धारा 36 को भी चुनौती दी गई है। इसे संबंधित नियमों और सातवीं अनुसूची के साथ पढ़ते हुए मीडिया संगठनों ने केंद्र सरकार की जानकारी मांगने से जुड़ी शक्तियों पर चिंता जताई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कुछ परिस्थितियों में सरकार डेटा फिड्यूशियरी और बिचौलियों से जानकारी मांग सकती है, लेकिन इन शक्तियों के इस्तेमाल के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं हैं।
डेटा फिड्यूशियरी क्या होता है? आसान शब्दों में, यह वह व्यक्ति या संस्था होती है जो व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल के उद्देश्य और तरीके तय करती है तथा कानून के तहत उससे संबंधित जिम्मेदारियां निभाती है।
बिचौलियों का क्या मतलब है? डिजिटल सेवाओं के संदर्भ में बिचौलियों में ऐसी ऑनलाइन सेवाएं या प्लेटफॉर्म शामिल हो सकते हैं, जो उपयोगकर्ताओं की जानकारी या डिजिटल सामग्री के आदान-प्रदान में भूमिका निभाते हैं। किसी खास संस्था पर कौन-से नियम लागू होंगे, यह उसकी भूमिका और संबंधित कानून पर निर्भर करता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि सरकार को जानकारी मांगने का अधिकार मिलता है, तो उसके इस्तेमाल की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। उन्होंने न्यायिक निगरानी, आवश्यकता और आनुपातिकता जैसे सुरक्षा उपायों की कमी को लेकर सवाल उठाए हैं। आनुपातिकता का अर्थ है कि किसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए उठाया गया कदम जरूरत से ज्यादा व्यापक या कठोर नहीं होना चाहिए।
मीडिया संगठनों को आशंका है कि यदि पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं हुई, तो पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा पैदा हो सकता है। इससे ऐसे लोग, जो भ्रष्टाचार या अन्य अनियमितताओं के बारे में जानकारी देना चाहते हैं, पत्रकारों से संपर्क करने में हिचक सकते हैं।
यह याचिकाकर्ताओं की आशंका है। अभी यह अदालत के सामने विचाराधीन मुद्दा है।
गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण है?
पत्रकारिता में गोपनीय सूत्रों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। कई बार सरकारी विभागों, संस्थानों या अन्य संगठनों में काम करने वाले लोग ऐसी जानकारी उपलब्ध कराते हैं, जो सार्वजनिक हित से जुड़ी होती है। यदि ऐसे लोगों को यह डर हो कि जानकारी साझा करने पर उनकी पहचान आसानी से उजागर हो सकती है, तो वे महत्वपूर्ण तथ्यों को सामने लाने से बच सकते हैं।
मीडिया संगठनों का कहना है कि पत्रकारों को अपने विश्वसनीय स्रोतों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। उनके अनुसार, गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा केवल पत्रकार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे भविष्य में जानकारी देने वाले दूसरे लोगों पर भी असर पड़ सकता है। इसी कारण याचिका में यह मांग उठाई गई है कि सरकार की सूचना मांगने संबंधी शक्तियों के इस्तेमाल में स्पष्ट सीमाएं और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
धारा 37 को लेकर क्या आपत्ति है?
याचिका में अधिनियम की धारा 37(1) को भी चुनौती दी गई है। यह कुछ निर्धारित परिस्थितियों में केंद्र सरकार को संबंधित डेटा फिड्यूशियरी के कामकाज पर कार्रवाई करने और सार्वजनिक सूचना तक पहुंच सीमित करने से जुड़ी शक्तियों से संबंधित है।याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस प्रावधान का दायरा बहुत व्यापक हो सकता है और इसका इस्तेमाल कुछ परिस्थितियों में खबरों के प्रसार को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।
मीडिया संगठनों की चिंता है कि यदि किसी डिजिटल मंच या प्रकाशक पर कार्रवाई के कारण जनहित से जुड़ी सामग्री तक पहुंच सीमित होती है, तो आम नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार पर भी असर पड़ सकता है। इस मुद्दे पर भी अदालत को यह देखना होगा कि कानून के तहत उपलब्ध शक्तियों का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जा सकता है, उनकी सीमाएं क्या हैं और उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए कौन-से उपाय जरूरी हैं।
पुराने डेटा संरक्षण विधेयकों में पत्रकारिता को छूट का प्रावधान था
याचिका में पहले के डेटा संरक्षण विधेयकों का भी उल्लेख किया गया है। मीडिया संगठनों का कहना है कि पुराने मसौदों में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट का प्रावधान था, लेकिन अंतिम कानून में ऐसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं रखी गई।
याचिका के अनुसार, व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक, 2018 में पत्रकारिता के उद्देश्यों के लिए छूट का प्रावधान था। वर्ष 2019 और 2021 के विधेयकों में भी पत्रकारिता से संबंधित गतिविधियों के लिए छूट देने की व्यवस्था शामिल थी। इसके बाद डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन विधेयक, 2022 में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट को उसी रूप में बनाए नहीं रखने का मुद्दा उठाया गया। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, इसके बजाय केंद्र सरकार की ओर से छूट अधिसूचित करने की व्यवस्था पर विचार किया गया।
मीडिया संगठनों का तर्क है कि जब पुराने विधेयकों में पत्रकारिता की विशेष प्रकृति को ध्यान में रखते हुए छूट का प्रावधान किया गया था, तो अंतिम कानून में भी स्पष्ट सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए थी। उनका कहना है कि पत्रकारिता को लेकर स्पष्ट नियम नहीं होने से समाचार संस्थानों के सामने कानूनी अनिश्चितता पैदा हो सकती है। इससे वे जनहित के मामलों की रिपोर्टिंग करते समय अतिरिक्त जोखिम महसूस कर सकते हैं।
शोध और अभिलेखीकरण को छूट, लेकिन पत्रकारिता को क्यों नहीं?
याचिका में एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया है। मीडिया संगठनों का कहना है कि कानून में शोध, अभिलेखीकरण और सांख्यिकीय प्रसंस्करण जैसी कुछ गतिविधियों के लिए विशेष छूट का प्रावधान है, लेकिन जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता को वैसी स्पष्ट छूट नहीं दी गई। अभिलेखीकरण का अर्थ पुराने दस्तावेजों, रिकॉर्ड और जानकारियों को भविष्य के लिए सुरक्षित रखना है। सांख्यिकीय प्रसंस्करण में आंकड़ों का विश्लेषण करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, पत्रकारिता भी कई मामलों में दस्तावेजों के अध्ययन, पुराने रिकॉर्ड की जांच, आंकड़ों के विश्लेषण और सार्वजनिक महत्व की जानकारी को व्यवस्थित करने पर निर्भर करती है ।इसलिए उनका कहना है कि जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता के लिए भी उचित कानूनी छूट पर विचार किया जाना चाहिए। याचिका में मौजूदा व्यवस्था को मनमाना बताते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई है।
DNPA ने पहले भी सरकार के सामने उठाया था मुद्दा
याचिका के मुताबिक, डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने अदालत जाने से पहले इस विषय पर केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों के सामने भी अपनी चिंताएं रखी थीं।
एसोसिएशन ने 10 अगस्त 2026 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को विस्तृत प्रतिवेदन सौंपा था। इसमें डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट और उससे जुड़े नियमों के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए गए थे। इसके बाद 25 अगस्त 2026 को एसोसिएशन के प्रतिनिधियों और मंत्रालयों के अधिकारियों के बीच बैठक भी हुई थी। याचिका में इन घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि मीडिया संगठनों ने अदालत का रुख करने से पहले सरकार के सामने अपनी आपत्तियां और सुझाव रखे थे।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट की ओर से केंद्र सरकार को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब मामले में सरकार का जवाब महत्वपूर्ण होगा। अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित है। आगे की कार्यवाही में अदालत को यह देखना होगा कि चुनौती दिए गए प्रावधानों का पत्रकारिता की स्वतंत्रता, नागरिकों की निजता और सूचना तक पहुंच के अधिकार पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
अदालत यह भी विचार कर सकती है कि कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है या नहीं और पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट अथवा अन्य कानूनी व्यवस्था पर किस प्रकार विचार किया जाना चाहिए। फिलहाल कानून की चुनौती दी गई धाराएं अपने आप समाप्त नहीं हुई हैं। केवल याचिका दायर होने या सरकार को नोटिस जारी होने से कानून पर रोक नहीं लग जाती। इस संबंध में कोई अंतरिम आदेश या अंतिम फैसला होने पर ही उसकी कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी।
निजता की सुरक्षा और प्रेस की आजादी के बीच संतुलन की परीक्षा
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट को लेकर उठे इस विवाद का मूल सवाल यह है कि नागरिकों की निजी जानकारी की रक्षा करते हुए पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कैसे सुरक्षित रखा जाए। एक तरफ आम नागरिकों का अधिकार है कि उनकी व्यक्तिगत जानकारी का अनुचित इस्तेमाल न हो। दूसरी तरफ मीडिया का दायित्व है कि वह जनहित से जुड़े मामलों की पड़ताल करे और तथ्यों को जनता के सामने रखे।
मीडिया संगठनों का कहना है कि यदि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट कानूनी छूट नहीं दी गई, तो खोजी खबरों, गोपनीय सूत्रों और महत्वपूर्ण सार्वजनिक मामलों की रिपोर्टिंग पर असर पड़ सकता है। वहीं, निजता की सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण कानूनी उद्देश्य है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर है। अदालत का रुख यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि डेटा संरक्षण के नियमों और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संतुलन किस तरह स्थापित किया जाए।